सोचै सोचि न होवई जे सोची लख वार ॥ चुपै चुप न होवई जे लाइ रहा लिव तार ॥guru granth sahib page 1 ,,,,,,,,,, गुरबानी यह कह रही है की निराकार क्या है यह तुम अपनी बुद्धि से खुद सोच कर उसके बारे में बता दो तो यह सम्भव नहीं है क्यों निराकार बुद्धि की ही पहच से परे है ,निराकार के बारे में सोच कर कुश भी बयान नहीं किया जा सकता है इस लिए गुरबानी ने सोचना बंद करवाया है क्योकि गुरबानी सिर्फ समझने का विशा है ,जब आदमी सोचता है तो मन से अपना ख्याल पैदा होता है और मन तो कल्पना में जी रहा है गुरबानी ने संसार को सपना ही कहा है सपने में कोई सच के बारे में कैसे सोच सकता है ,,,गुरबानी कह रही है की यह समझने का विशा था तुम सोचने लग गए गुरबानी को समझने के लिए निराकार को समझने के लिए खुद की सोच छोड़ कर ज्ञान को समझना है केवल ,,,संसार में तो जीव केवल समझने के लिए ही आया है ,अगर कुश नया बनाना हो तब ही सोचने की जरुरत है जिसने बिजली पैदा की उसने सोचा अब हमे पैदा करने के लिए सोचने के नहीं समझने की जरुरत पड़ती है ,,,,परमेश्वर ने अपना ज्ञान भगतो को दिया जैसे विज्ञानी अपना ज्ञान दुनिया को देते है अब हमे...
गउड़ी सुखमनी 132 ठाकुर का सेवकु आगिआकारी ॥ ठाकुर का सेवकु सदा पूजारी ॥ यहाँ १ की बात की जा रही है जब मन अपने मूल में समाया हुआ है । अब मन सेवक है और मूल ठाकुर है । यहाँ मन अपने ठाकुर मूल का आज्ञाकारी सेवक है । भगवद गीता में यहीं आकर कृष्ण ने “मैं” कह दिया । १ होकर यह कहना कि मैं ही ब्रह्म हूँ मैं ही सब कुछ हूँ मैं ही सब करता हूँ यहीं आकर गलती है । यहाँ हौमे पैदा हो गयी । उपरोक्त शलोक में गीता में हुई गलती को सुधारा गया है । गीता कृष्ण ने स्व्म नहीं लिखी यह भी किसी पंडित की लिखी हुई है यह भी कई प्रकार की है । इस अवस्था में आकर यदि मैं कहा जाये तो खसमै करे बराबरी फिरि गैरति अंदरि पाइ ॥ अंग 474 सेवक तभी है यदि वह आज्ञाकारी है । यदि आज्ञाकारी नहीं तो वे सेवक नहीं है । ठाकुर का सेवक सदा पुजारी होता है । उसने तन मन धन ठाकुर को सौंपा हुआ होता है । उसकी अपनी कोई राय या मर्जी नहीं होती । जो ठाकुर करता है उसी को स्वीकार करता है । लेकिन आज कल पुजारी उसे कहा जाता है जो गुल्लक पर अपना हाथ साफ करता है । जिसके कब्जे में गुल्लक है आज वही पुजारी है । गुरबानी वाला पुजारी और संसार...
गउड़ी सुखमनी 178 सलोकु ॥ गिआन अंजनु गुरि दीआ अगिआन अंधेर बिनासु ॥ हरि किरपा ते संत भेटिआ नानक मनि परगासु ॥१॥ चित मन की एकता के बिना बाहर किसी से एकता नहीं हो सकती। मन सच पर यकीन ही नहीं करता । अपनी अंतरात्मा की आवाज पर ही यकीन नहीं है । जब अपनी ही अंतरात्मा की आवाज अच्छी ना लगे तो उसका अर्थ यही है कि बुद्धि विपरीत है । यह विनाशकाल का ही प्रतीक है । अंतरात्मा की आवाज न सुनना सच को न सुनना है । अंतरात्मा की आवाज के विपरीत चलने वाले ही जन्म मरण में रहते हैं । यहाँ गुर अर्जुन देव अपनी बात कर रहे हैं कि गुर ने हमारी बुद्धि की नजर में ज्ञान का सुरमा डाल दिया है ताकि अज्ञानता रुपी अन्धेरा दूर हो जाए । ज्ञान द्वारा ही अज्ञ्रानता ठीक होती है । जो लोग माया की दौड़ में लगे हुआ हैं वे अज्ञानता की दौड़ में लगे हुए हैं । जब तक इस अज्ञानता का इलाज नहीं होता तब तक शांति नहीं मिल सकती । जिससे शांति मिले वही संत है । शांति देने वाला शब्द ही संत है । ज्योत की देहि शब्द है । जो अंतरात्मा की आवाज है वही संत है । हरि की कृपा द्वारा, पूर्ण ब्रह्म की कृपा द्वारा, परमेश्वर की कृपा द्वारा ह...
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